Monday, August 25, 2008

ज़माना आ गया रुसवा‌इयों तक तुम नहीं आये

ज़माना आ गया रुसवा‌इयों तक तुम नहीं आये

जवानी आ ग‌ई तनहा‌इयों तक तुम नहीं आये

धरा पर थम ग‌ई आँधी, गगन में काँपती बिजली,

घटा‌एँ आ ग‌ईं अमरा‌इयों तक तुम नहीं आये

नदी के हाथ निर्झर की मिली पाती समंदर को,

सतह भी आ ग‌ई गहरा‌इयों तक तुम नहीं आये

किसी को देखते ही आपका आभास होता है,

निगाहें आ ग‌ईं परछा‌इयों तक तुम नहीं आये

समापन हो गया नभ में सितारों की सभा‌ओं का,

उदासी आ ग‌ई अंगड़ा‌इयों तक तुम नहीं आये

न शम्म'अ है न परवाने हैं ये क्या 'रंग' है महफ़िल,

कि मातम आ गया शहना‌इयों तक तुम नहीं आये.

--बलबीर सिंह 'रंग'

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