Thursday, August 28, 2008

तेरी मोम की दुनिया में लोग पिघलने से डरते हैं.

कागज की नाव, रेत के टीले, महल हवाओं के और इन्सान पत्थर के
सुना हैं तेरी मोम की दुनिया में लोग पिघलने से डरते हैं.


बहुत चर्चा सुना हैं तेरे नाम का, और उस नाम का जिसे प्रेम कहते हैं
कितने ही बार टूटे शीशे इनके, पर लोग जुटाने में लगे रहते हैं


तू ही जाने किसे पत्थर पारस मिला और वह जिसे कस्तूरी कहते हैं
मैंने सदा इन्हे तेरे ही नाम समझे, जिसे तेरी दुनिया में प्रेम कहते हैं

जितना आसान पारस, कस्तूरी का मिलना, उतना ही तेरा भी
इस
मायाजाल में, प्रेम कहो या कुछ और, बस तेरे ही नाम चलते हैं

सुना हैं मिलता उसी को हैं, जिसकी मांग भी नही बचती हैं
पर फिहरिस्त में तेरे सिवा लोग हर मोम की चीज़ का जिक्र करते हैं

तुने कहा 'दो' नही, 'मैं' का विस्तार नही, पर दो में बटा तेरा संसार हैं
कबीर, मीरा, रैदास, तुलसी, जाने किस प्रेम कि कहानी गढ़ते रहते हैं


कितना जाल बिछाया हैं माया ने रस, रूप, गंध, स्पर्श और शब्द का
तेरी ही माया कि, प्रेम के नाम से यहाँ हजारो जालसाज चलते हैं


प्रेम मूल, प्रेम नींव, प्रेम शाश्वत, तुने सदा कहा, पर समझा कौन हैं
यहाँ तो लोग टुटा तारा अंजलि में संजोने का शौक रखा करते हैं

कितने ही बार टूटे शीशे इनके, पर लोग जुटाने में लगे रहते हैं
पता नही क्यूँ तेरी मोम की दुनिया में लोग पिघलने से डरते हैं.

--Ranjitt Khomne Thu, Aug 28, 2008, 8.36 am

Monday, August 25, 2008

ज़माना आ गया रुसवा‌इयों तक तुम नहीं आये

ज़माना आ गया रुसवा‌इयों तक तुम नहीं आये

जवानी आ ग‌ई तनहा‌इयों तक तुम नहीं आये

धरा पर थम ग‌ई आँधी, गगन में काँपती बिजली,

घटा‌एँ आ ग‌ईं अमरा‌इयों तक तुम नहीं आये

नदी के हाथ निर्झर की मिली पाती समंदर को,

सतह भी आ ग‌ई गहरा‌इयों तक तुम नहीं आये

किसी को देखते ही आपका आभास होता है,

निगाहें आ ग‌ईं परछा‌इयों तक तुम नहीं आये

समापन हो गया नभ में सितारों की सभा‌ओं का,

उदासी आ ग‌ई अंगड़ा‌इयों तक तुम नहीं आये

न शम्म'अ है न परवाने हैं ये क्या 'रंग' है महफ़िल,

कि मातम आ गया शहना‌इयों तक तुम नहीं आये.

--बलबीर सिंह 'रंग'

Monday, August 18, 2008

...घर मेरा जल रहा था, समंदर करीब था

मिलना था इत्तेफाक, बिछड़ना नसीब था
वह उतनी दूर हो गया, जितना करीब
था

मैं उसको देखने के लिए तरसती ही रह गई
जिस शख्स की हथेली पर मेरा नसीब था

दफना दिया गया मुझको चांदी की कबर में
मैं जिसको चाहती थी वह लड़का अमीर था

बस्ती के सारे लोग ही आतिशपरस्त थे
घर मेरा जल रहा था, समंदर करीब था
-Anon

Thursday, August 14, 2008

...और मुझे महोब्बत न करो.....

इक इल्तज़ा है तुमसे
कि मेरे दोस्त बन जाओ
और मुझसे मुहब्बत न करो.....
यह तमन्ना है कि मेरी ज़िन्दगी में आओ
और मुझसे मुहब्बत न करो............॥

सिवा तुम्हारे कुछ सोचूँ नहीं मैं
सोचता हूँ, बता दूं
मगर रूबरू जब तुम हो तो कुछ बोलूं नहीं मैं ...
काश ऐसा हो कि
मैं तुम, तुम मैं बन जाओ
और मुझसे मुहब्बत न करो.....॥

अक्सर देखा है
मुहब्बत को नाकाम होते हुए
साथ जीने के वादे किए
फिर तनहा रोते हुए.......

जो हमेशा साथ निभाए..वो तो बस दोस्ती है
जो कभी ना रूलाए..वो तो बस दोस्ती है........
यूँ ही देखा है बचपन कि दोस्ती को बूढा होते हूए
ना किए कभी वादे..पर हर वादे को पूरा होते हूए...॥

यह तमन्ना है के मेरी ज़िन्दगी में आओ
और मुझसे मुहब्बत न करो.....
ये इल्तज़ा है के मेरे दोस्त बन जाओ
और मुझसे मुहब्बत न करो...........॥

यु ही ताउम्र मेरा साथ निभाओ
और मुझसे मुहब्बत न करो...........
और मुझसे मुहब्बत न करो...........॥
-Anon

Monday, August 11, 2008

वन्दे मातरम्

वन्दे मातरम् सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्शस्यशामलां मातरम् ।
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीं फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं सुहासिनीं सुमधुर भाषिणींसुखदां वरदां मातरम् ।। १ ।।

वन्दे मातरम् ।कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-करालेकोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले, अबला केन मा एत बले ।बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं रिपुदलवारिणीं मातरम् ।। २ ।।

वन्दे मातरम् ।तुमि विद्या, तुमि धर्म तुमि हृदि, तुमि मर्मत्वं हि प्राणा: शरीरे बाहुते तुमि मा शक्ति, हृदये तुमि मा भक्ति, तोमारई प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे मातरम् ।। ३ ।।

वन्दे मातरम् ।त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी कमला कमलदलविहारिणीवाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम् नमामि कमलां अमलां अतुलां सुजलां सुफलां मातरम् ।। ४ ।।

वन्दे मातरम् ।श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषितां धरणीं भरणीं मातरम् ।। ५ ।। वन्दे मातरम् ।।
--Bankim Chandra Chattopadhay

Saturday, August 9, 2008

........उरते कविता

आकाशाच्या रम्य पटावर स्मरते कविता
एकान्ताच्या पाणवठ्यावर स्फुरते कविता...

चैत्रपालवी, श्रावणधारा अपुल्या जागी,
वैशाखातून रंग अनोखे भरते कविता...

दंभाच्या या शर्यतीत मी सामिल होतो,
जिंकून जातो मी तेव्हा पण हरते कविता!

कधी कधी ती आईइतकी मोठी होते,
कधी प्रेयसी बनून माझी झुरते कविता.

'कुणीच' नसल्याचा झालो मी जर आरोपी,
अस्तित्वाचा एक पुरावा ठरते कविता...!

चराचरातील ईश्वर हेवा करेल ऐशी,
विश्व व्यापुनी दशांगूले वर उरते कविता...

-ज्ञानेश पाटिल
जळगाव.

Sunday, August 3, 2008

अब तेरी याद से वहशत नहीं होती मुझको

अब तेरी याद से वहशत नहीं होती मुझको
जख्म खुलने से अजियत नहीं होती मुझको.


अब कोई आये, चला जाए, खुश रहता हु मैं,
अब किसी शख्स की आदत नहीं होती मुझको.

ऐसा बदला हूँ तेरे शहर का पानी पीकर,
झूठ बोलू तो निदामत नहीं होती मुझको.

मैंने भी की हैं मुहब्बत, सो किसी की खातिर
कोई मरता हो तो हैरत नहीं होती मुझको.

इतना मसरूफ हु जीने की हवस में यारो
सांस लेने की भी फुर्सत नहीं होती मुझको...

Anon

Wednesday, July 16, 2008

प्राजक्ताचा सडा.....

कोपर्‍यावरचा प्राजक्त, तुला बघितलं की फुलतो..
तुझ्याबद्दल जिव्हाळा, त्याच्याही मनात झुलतो...

पण तू मात्र कधीच, त्याची दखल घेत नाहीस...
आणि तो पण वेडा, तुझी वाट पाहणं सोडत नाही...

त्याला विश्वास असतो, तू बघशील त्याच्याकडे प्रेमानं...
तो ही मग शेजारच्या वडासारखा, तरारेल मग जोमानं...

तो फुलतो, झडतो अन् पुन्हा नव्याने फुलत राहतो...
तुझ्यावर मात्र मनापासून, मूकपणे प्रेम करत राहतो...

आणि मग अचानक एके दिवशी, लग्न तुझं ठरतं...
त्याला बातमी कळताच, त्याचंही मन भिरभिरतं...

निकराचा प्रयत्न म्हणून, तो जोमानं फुलू पाहतो...
सौंदर्याचा कळस गाठून, अस्तित्व विसरुन जातो...

तरी तू मात्र येत नाहीस, दर्शन त्याला देत नाहीस...
त्याच्या निःशब्द भावनांना, तू समजून घेत नाहीस..

प्रेमभंगाच्या दुःखामध्ये, त्याचा अश्रूंशी लढा असतो...
तुझ्या पाठवणीच्या पायघडीवर मात्र त्याच प्राजक्ताचा सडा असतो...

---निरज कुलकर्णी.

Monday, July 14, 2008

क्या खुदा भी उसका था !

मंजिलें भी उसकी थी
रास्ता भी उसका था


एक मै अकेला था
काफिला भी उसका था

साथ-साथ चलने कि सोच भी उसकी थी
फिर रास्ता बदलने का फैसला भी उसका था

आज क्यों अकेला हूँ मै ?
दिल सवाल करता है यह ....

लोग तो उसके थे , क्या खुदा भी उसका था !

--Anon


दिल धड़कने का सबब याद आया

दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी अब याद आया


आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया

दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से
फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया

तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा
मर रहेंगे अगर अब याद आया

फिर कई लोग नज़र से गुज़रे
फिर कोई शहर-ए-तरब याद आया

हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए तब याद आया

बैठ कर साया-ए-गुल में "नासिर"
हम बहुत रोये वो जब याद आया
- नासिर काज़मी

Sunday, July 13, 2008

तू हसा ना सकी ए जिंदगी हमको...

तू हसा ना सकी ए जिंदगी हमको लेकिन तेरी हर एक बात पे हमको तो हंसना आया....

Tuesday, July 1, 2008

पाउस

मनातला पाउस, अंगणातला पाउस,
भुवंयाँखालच्या दोन तळ्यातला पाउस

तुझा पाउस, माझा पाउस, प्रत्येकाचा वेगळा पाउस,
युगुलांचा, पक्ष्यांचा पाउस; अंग चोरून आईला बिलगणार्य़ा वासराचा पाउस.

पण मनातला पावसापेक्षा कितीतरी वेगळा वास्तवातील पाउस,
म्हणुनच वाटतं, पुर्णब्रह्म निर्माण करण्यार्या ब्राहणाचा ही कधी असतो का पाउस?

येत नाही, बरसत नाही तोवर सगळ्यांना वाट पाहायला लावणारा पाउस,
मला, मोराला, वेली फुलांना आणि माझ्या सर्जाला ही चातक बनवणारा पाउस.

सगळेच केव्हा न केव्हा चातक बनतात, सगळ्यांनाच हुरहुर लावतो पाउस,
डोळ्यापुढे खरा चातक असुनही, मनालाच चातक बनवतो पाउस.

तुझे माहीत नाही पण माझ्या परसात आज कोसळतोय पाउस,
पुन्हा डोळ्यांपुढे, तुला, मोराला, अन माझ्या सर्जाला आणतोय पाउस.

तिच्या मनाचा अनभिषिक्त सम्राट म्हणुन मोर नाचतोय पाउस्,
कुठल्या ओल्या पानांच्या आड़ लपलीय म्हणुन कोकिळ गातोय पाउस.

नियतीच्या भीतीने झाडाला अधिकच बिलगलेल्या वेलीला डरावतोय पाउस,
कष्टात भिजलेल्या बिजवैच्या भविष्य़ाबद्द्ल सर्जाला पोखरतोय पाउस.

काहींना त्याच्या थांबण्याची ही वाट आहे--कधी थांबेल हा पाउस,
माझ्या मनातील पहाट क्षणभंगुर ठरल्याची साक्ष हा पाउस.

मोर्, कोकिळ्, आणि तुझ्या स्वप्नांना सप्तरंगात रंगवत राहील पाउस
माझ्या अन सर्जाच्या नव्या पहाटेच्या रहस्याचा राजदां पाउस


पुन्हा कदाचित तु, मोर्, कोकिळ, येणार नाहीत, पण येत राहील पाउस
फक्त अंगणातला कि भुवयांखालच्या दोन तळ्यातला, हा प्रश्न उडवत राहिल पाउस....
---रणजीत खोमणे

Sunday, June 29, 2008

What will Sepia Mode carry

Sepia Mode is for every moment of life that you cherish. And it does not have to be a happy one! For, as far as my mind can race, I can see that only a heart which CAN feel sorrow has given rise to most and the best of world poetry, literature, cinema, music and all that an astrologer would say, the Moon rules!!


While most will agree that the mind conjures up most complexities in life, it is the heart that compassionately heals them.

Love is the eternal emotion in life and in divinity. It is all-encompassing. Only love can heal, whether it is torn relationships within a 2BHK (Mumbai's lingo for bedroom hall kitchen) or the killing fields of the Gaza strip..

Ironically, not many of us know what love is. And, no, we are not here to teach each other; for no one likes being taught--We are such tailormade complete individuals..


Yes, we are living in troubled times. In times that are insecure, in times where we are afraid of ourselves, our own emotions. In times, when most of us put up a facade for something or the other..

We fear the unknown though that is such a basic emotion since evolution..But on the other hand, we behave and act as if we are so much in control of ourselves..We can't stop talking about me, my world, ithoughtasmuch kind, i did this, i hate that, and i dislike that...

Er, lest we forget, afterall, we live in a plastic, thermocol, tupperware world, and we are no different. Our relationships are no different...How profesionally we manage our relationships!! Alas they could be called so in the first place. They are alliances of convenience.

We think we can wriggle out of this dirt, but we go deeper and deeper into it..Anyway, this is my experience of things I see around. I would like to know yours. And we are not here to teach, we are hear to learn, to share, and experience, that once upon a time--all of us were human..

Sepia Mode would publish poetry, articles, short stories, with due credit. And diary items...Thoughts to myself kind..Experiences, reflections on everyday events which can convey a deeper meaning, a deeper insight into our psyche...so that we can become human once again. So, that we can understand, yes, love...

Sepia Mode--Intro

नमस्कार. सेपिया मोड में आपका स्वागत हैं. टेक्नोलॉजी के इस युग में, मोबाइल फ़ोन, डिजीटल कैमरे और विशेष कर ऑरकुट और जी जीमेल के जमाने में, शायद ही कोई हो जिसे सेपिया मोड पता न हो. जो बिता हुआ हो, जिसे देखते हुए आपके मानसपटल के रंग बदल जाते हो, जिसमे अब कोई बदलाव सम्भव न हो, वह सेपिया मोड. जिंदगी के इस सेपिया मोड में एडिट आप्शन नही होता! जो जैसा था, वाकई बहोत सुंदर था. फ़िर वह गाव की गलियों के बीच बिता बचपन हो, कुछ टूटे ख्वाब हो, कुछ बिखरे हुए पल हो. कुछ बाते जो घटी, और कुछ वह जो आधी अधूरी रह गई, वह सेपिया मोड. मुझे लगता हैं हम में से हर किसीके जीवन एक सेपिया मोड होता हैं. कुछ उसे भूल जाने की समझदारी दिखाते हैं, कुछ उसे दिलोदिमाग के किसी कपाट में दूर कही बंद किए देते हैं. प्रायः तो यह कपाट खुलते नही हैं, लेकिन कुछ लोगो के लिए सेपिया मोड ही जीवन बन जाता हैं. वर्त्तमान की कई सारी बाते इतनी बेमानी हो जाती हैं, इतनी मशीनी हो जाती की हैं, की अतीत बहोत सुहावना प्रतीत होता हैं. कहते हैं हर जीव खुशी चाहता हैं--आनंद आदमी का मूल स्वाभाव हैं...अगर कुछ लोगो के लिए इस खुशी का नाम सेपिया मोड हो तो ऐसे हे सही..गैर क्या हैं. क्या वर्त्तमान, क्या भूत और क्या भविष्य, जब सब खेल हैं. लेकिन हर वर्त्तमान सेपिया नही हो सकता. इसलिए सेपिया की अहमियत कुछ और हैं. इसलिए किसीके लिए जीवन का नाम सेपिया मोड हैं. स्वागत!!!